गद्य कवितावां / नीरज दइया

कवि नीरज दइया रा दोय कविता संग्रै "साख" अर "देसूंटो" प्रकासित नै चर्चित । राजस्थानी मांय संपादक रै रूप "नेगचार" सूं ओळख मिली अर पंजाबी कवयित्री अमृता प्रीतम अर हिंदी कथाकर निर्मल वर्मा री पोथ्या रा आप अनुवाद ई करिया । अकादमी अर दूजा मान सम्मान ई मिल्योड़ा ।आप राजस्थानी मांय पैली लघुकथावां लिखी अर संग्रै "भोर सूं आथण तांई" प्रकासित ई हुयो । पोथी "आलोचना रै आंगणै" छपण मतै । आं दिनां रैवास सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर)  । ई-मेल : neerajdaiya@gmail.com

ऊंठ
            ओ ऊंठ दांईं सूतो ई रैसी कांई?” जीसा रा बोल उठतां ई उण रै कनां पड्‌या। स्यात्‌ बो खासी ताळ भळै ई सूतो रैवतो, पण अबै बो आंख्यां मसळतो उठग्यो हो। पण जागता थकां ई बो तुरत पाछो नींद में भळै जाय पूग्यो, जठै बीं नै सपनो याद आयो हो।      
            बो सपनै में देख्यो हो कै बो सचाणी ई ऊंठ बणग्यो है। पण अबखाई आ ही कै बो ऊंठ बण्यां उपरांत ई सोचै हो कै बो कांईं करै। अठी-उठी हांडता-हांडता ई उण नै कोई मारग कोनी लाध्यो, च्यारूंमेर रिंधरोही ही अर उण रै किणी सवाल रो जबाब बठै कठै लाधतो। बिंयां बो घोर अचरज में ई हो कै बो बैठो बैठायो इंयां ऊंठ किंयां बणग्यो। घर अर मा-जीसा री याद ई उण नै आई पण बो जाणै बेबस हो। उठ’र दो च्यार गडका काढ्यां ई उण नै निरांयत नीं बापरी तो आभै कानीं नाड़ ऊंची कर’र ठाह करण री कोसीस करी कै नाड़ कित्ती लांबी है। ओ भणाई रो असर हो कै बो नाड़ तुरत ही हेठै कर ली। उण नै भाई रा बोल चेतै आया कै ऊंठ री नसड़ी लांबी हुवै तो कांई बा बाढण तांई हुवै है।
            जीसा कैवै हा- “चमगूंगा, इंयां चमक्योड़ै ऊंठ दांई अठी-उठी कांईं देखै। उठ, देख कित्तो सूरज माथै आयग्यो।" उण नै चेतै आयो कै रात सूवण सूं पैली ई जीसा उण नै झिडकता थकां कैयो हो कै "लड़धा, ऊंठ जित्तो हुयग्यो। अबै कीं काम-धंधो कर्‌या कर।"  
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चालो माजी कोटगेट
बड़ी गवाड़ बीकानेर माथै एक तांगैवाळो हो जिको हरेक चलतै नै बकारतो- चालो माजी कोटगेट। बो काल म्हारै सपनै में आयो। म्हैं बीं नै ओळख लियो कारण कै एक दिन एक रस्तै चालती लुगाई आप री चप्पल काढ़ ली- रे धबिया, म्हैं कांईं थनै माजी दिखूं? बो दिठाव ही हो जद पछै म्हैं उण तांगै वाळै नै गौर कर्‌यो कै बो हरेक चलतै नै बकारतो- चालो माजी कोटगेट।
सपनो ई क्या चीज हुवै कांईं कांईं नीं दिखाय देवै, बो म्हनै कैयो- भाई जी, बीड़ी पाओ। अर घणै सूतम री बात कै म्हैं ई ठाह नीं क्यूं खुद री चप्पल काढ़ ली अर उण नै कैयो कै- रे धबिया, म्हैं कांईं थनै बीड़ीबाज दिखूं?
बीं रै गयां पछै म्हैं सपनै मांय विचारतो रैयो कै म्हैं उण री जरा सी फरमाइस माथै इंयां किंयां कैयग्यो। पण अबै कांईं कारी लागै। सपनै में उण पछै म्हैं आसै-पासै दुकानां नै जोवतो खासी आफळ करी कै कदास कोई दुकान लाध जावै। जे दुकान लाध जावै तो म्हैं बीड़ियां रो बंडळ लेय’र दौड़तो जावूं अर उण नै पकड़ा देवूं। इत्तै मांय बो ई तांगै वाळो जाणै कठीनै सूं निकळ’र आयग्यो अर पागल कोटगेट माथै तांगो लिया ऊभो बोलै हो- चालो माजी कोटगेट।
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Comments

2 Responses to “गद्य कवितावां / नीरज दइया”

May 25, 2011 at 6:58 PM

चालो माजी कोटगेट .. बोत ही बढिया. हिवडै माय सार देवण वाळी सगळी रचनावा है..

May 26, 2011 at 12:35 AM

वाह भई नीरज जी,
जोरदार गद्य कवितावां !
ठावका प्रयोग !
बधायजै !